लंबे लिव-इन संबंधों से जन्मे बच्चों को पैतृक संपत्ति में हिस्सा: सुप्रीम कोर्ट का अहम फैसला
भारत में लिव‑इन रिलेशनशिप अब शहरों से निकलकर छोटे कस्बों तक सामान्य सामाजिक हकीकत बन चुकी है, लेकिन कानून और समाज दोनों ही लंबे समय तक इसे “धुंधले इलाके” की तरह देखते रहे। अदालतों के सामने सबसे बड़ा सवाल हमेशा यह रहा कि यदि दो वयस्क बिना विवाह के पति‑पत्नी की तरह रह रहे हों, तो ऐसे संबंध से जन्मे बच्चों के अधिकार क्या होंगे। हाल के वर्षों में सुप्रीम कोर्ट ने कई बार स्पष्ट किया है कि बच्चे किसी भी तरह के संबंध से उत्पन्न हों, उन्हें सम्मान और अधिकारों से वंचित नहीं किया जा सकता।
केस परिचय: Kattukandi Edathil Krishnan बनाम Kattukandi Edathil Valsan (2022)
इस महत्वपूर्ण निर्णय का आधार केरल से आया मामला Kattukandi Edathil Krishnan & Ors v. Kattukandi Edathil Valsan & Ors (2022) था। वाद में विवाद पैतृक संपत्ति के बंटवारे और परिवार की वंशावली में कुछ बच्चों की वैधता से जुड़ा था, जिन्हें विरोधी पक्ष “अवैध” बता कर संपत्ति से बाहर रखना चाहता था। अदालत के सामने प्रश्न यह था कि क्या लंबे समय तक चले लिव‑इन जैसे संबंध से जन्मे बच्चों को भी वैध संतान की तरह पैतृक संपत्ति में हिस्सा मिलेगा।
तथ्य: परिवार, संबंध और विवाद की पृष्ठभूमि
परिवार की पृष्ठभूमि में एक पुरुष और महिला लंबे समय तक साथ रहे, समाज की नजर में उन्हें दंपति की तरह ही देखा जाता था, लेकिन विवाह का औपचारिक रजिस्ट्रेशन और परंपरागत साक्ष्य विवादित थे। इसी संबंध से कुछ बच्चे पैदा हुए, जिन्हें बाद में पैतृक घर की संपत्ति के बंटवारे के समय उत्तराधिकार से बाहर रखने की कोशिश की गई। विरोधी पक्ष का तर्क था कि जब विवाह ही सिद्ध नहीं है तो इन बच्चों का जन्म “वैध विवाह” से नहीं माना जा सकता, इसलिए इन्हें हिंदू उत्तराधिकार कानून के तहत पुत्र/पुत्री की तरह हिस्सा नहीं मिलना चाहिए। दूसरी ओर, बच्चों के पक्ष ने कहा कि माता‑पिता लंबे समय तक पति‑पत्नी की तरह रहे, समाज ने भी उन्हें वैवाहिक जोड़े के रूप में स्वीकार किया, इसलिए उन्हें वैध दांपत्य से कम नहीं माना जा सकता।
कानूनी प्रश्न: लिव‑इन से जन्मे बच्चों की वैधता
सुप्रीम कोर्ट के समक्ष मूल प्रश्न तीन स्तरों पर था।
- क्या लंबे समय तक साथ रहना और समाज द्वारा पति‑पत्नी की तरह स्वीकार किया जाना “विवाह” की मजबूत प्रेज़म्पशन (कानूनी अनुमान) पैदा करता है।
- यदि हाँ, तो क्या ऐसे संबंध से जन्मे बच्चों को वैध संतान माना जाएगा।
- और क्या ऐसे बच्चों को पैतृक/संयुक्त परिवार की संपत्ति में उत्तराधिकार का वही अधिकार मिलेगा जो विवाहित दंपति से जन्मे बच्चों को मिलता है।
इन सवालों के जवाब केवल हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 और हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 की व्याख्या से ही नहीं, बल्कि भारतीय साक्ष्य अधिनियम तथा पहले के न्यायिक फैसलों की रोशनी में भी खोजे गए।
सुप्रीम कोर्ट की सोच: “लंबा साथ = विवाह की प्रेज़म्पशन”
सुप्रीम कोर्ट ने सबसे पहले यह दोहराया कि यदि कोई पुरुष‑महिला बहुत लंबे समय तक साथ रह रहे हों और समाज उन्हें पति‑पत्नी मानता हो, तो कानून भी इसे विवाह की प्रेज़म्पशन के रूप में देखता है, जब तक इसके विपरीत कोई ठोस सबूत न हो। अदालत ने कहा कि केवल इस आधार पर कि औपचारिक शादी का प्रमाणपत्र नहीं है या पूरी रस्मों के साक्ष्य पेश नहीं हो सके, इस लंबे दांपत्य‑सदृश संबंध को अवैध नहीं कहा जा सकता। इसी तर्क के आधार पर कोर्ट ने माना कि इस तरह के स्थायी लिव‑इन संबंध से पैदा हुए बच्चों को “वैध संतान” की श्रेणी में रखा जाना चाहिए।
निर्णय: बच्चों के पैतृक संपत्ति अधिकार
फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा कि यदि लिव‑इन रिलेशनशिप लम्बे समय तक चली हो और पक्षकार पति‑पत्नी की तरह रहे हों, तो ऐसे संबंध से जन्मे बच्चों को माता‑पिता की पैतृक संपत्ति में हिस्सा पाने का अधिकार है। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि बच्चों के अधिकारों का निर्धारण करते समय हमें माता‑पिता के व्यक्तिगत आचरण या विवाह की तकनीकी कमियों के आधार पर उनके साथ भेदभाव नहीं करना चाहिए। नतीजतन, संबंधित बच्चों को संयुक्त पारिवारिक/पैतृक संपत्ति में वही उत्तराधिकार मिला जो किसी वैध विवाह से जन्मे बच्चों को मिलता है।
पहले के फैसले और इस निर्णय की कड़ी
यह फैसला किसी एकाएक आई सोच का परिणाम नहीं, बल्कि सुप्रीम कोर्ट की लगातार विकसित होती न्यायिक दृष्टि की अगली कड़ी है। इससे पहले भी अदालत ने विभिन्न मामलों में कहा था कि लंबे समय तक साथ रहने वाले जोड़े के संबंध को विवाह माना जा सकता है और ऐसे संबंध से जन्मे बच्चों के अधिकार सुरक्षित हैं। उदाहरण के तौर पर, अदालत ने यह रेखांकित किया था कि बच्चे “अवैध” नहीं हो सकते; यदि संबंध सामाजिक रूप से स्वीकृत हो और स्थायी प्रकृति का हो, तो उसमें जन्मे बच्चों को विवाहेतर संतान के रूप में कलंकित नहीं किया जा सकता।
हिंदू उत्तराधिकार कानून पर प्रभाव
Hindu Succession Act, 1956 के तहत पैतृक/संयुक्त परिवार की संपत्ति में बेटे‑बेटियों को जन्म से सह‑उत्तराधिकारी (coparcener) का अधिकार मिलता है, जिसे 2005 संशोधन के बाद बेटियों तक समान रूप से विस्तार दिया गया। सवाल यह था कि क्या लिव‑इन से जन्मे बच्चे भी इस “जन्मसिद्ध” अधिकार का लाभ उठा सकेंगे। सुप्रीम कोर्ट के इस निर्णय ने स्पष्ट किया कि जब कोर्ट ऐसे लंबे लिव‑इन को विवाह की तरह मान लेती है, तो इन बच्चों के उत्तराधिकार अधिकार भी वैध विवाह से जन्मे बच्चों के समान होंगे, बशर्ते परिवार व सामाजिक परिस्थितियां विवाह‑सदृश संबंध को समर्थन देती हों।

“अवैध संतान” की अवधारणा पर पुनर्विचार
भारतीय पारिवारिक कानून में लंबे समय तक “अवैध” या “illegitimate” शब्द का उपयोग उन बच्चों के लिए होता रहा जो विवाहेतर संबंध से जन्मे हों। आधुनिक न्यायशास्त्र ने इस शब्दावली को कठोर और भेदभावपूर्ण मानते हुए इसे धीरे‑धीरे हटाने की कोशिश की है। सुप्रीम कोर्ट ने भी इस फैसले में दोहराया कि किसी भी स्थिति में बच्चे को दंडित नहीं किया जा सकता, क्योंकि उसने अपने जन्म की परिस्थितियों का चुनाव नहीं किया; इसलिए कानून का उद्देश्य बच्चों की सुरक्षा और समानता सुनिश्चित करना होना चाहिए, न कि सामाजिक कलंक को कानूनी मंजूरी देना।
किन शर्तों पर मिलेगा हिस्सा: “लंबे समय” और “पति‑पत्नी की तरह रहना”
फैसले के बाद सबसे बड़ा व्यावहारिक प्रश्न यह उभरता है कि “लंबे समय तक लिव‑इन” और “पति‑पत्नी की तरह रहना” को कैसे परिभाषित किया जाएगा। अदालत ने सख्त समय सीमा (जैसे पाँच साल, दस साल) तय नहीं की, बल्कि कहा कि हर केस के तथ्य, जैसे संयुक्त बैंक खाते, साझा आवास, बच्चों का पालन‑पोषण, समाज में पति‑पत्नी के रूप में परिचय, रिश्तेदारों द्वारा स्वीकार्यता आदि देखे जाएंगे। यदि सबूतों से यह स्थापित हो जाये कि दोनों ने खुद को पति‑पत्नी की तरह प्रोजेक्ट किया और समाज ने भी उन्हें उसी रूप में स्वीकार किया, तो अदालत विवाह की प्रेज़म्पशन के पक्ष में झुकेगी और बच्चों के अधिकार मजबूत हो जाएंगे।
व्यावहारिक उदाहरण: अदालत में क्या सबूत काम आएंगे
मान लीजिए अहमदाबाद में रहने वाला एक जोड़ा लगभग 15 साल से साथ रह रहा है, पड़ोसी उन्हें पति‑पत्नी के तौर पर जानते हैं, बच्चों के स्कूल रिकॉर्ड में माता‑पिता के नाम दर्ज हैं, राशन कार्ड या आधार पर एक ही पते पर परिवार दिखाया गया है। यदि बाद में पैतृक संपत्ति के बंटवारे के समय किसी रिश्तेदार ने यह कहकर बच्चों का हिस्सा रोकने की कोशिश की कि “शादी तो हुई ही नहीं थी”, तो इस फैसले की रोशनी में अदालत ऐसे बच्चों के अधिकारों को मजबूती से स्वीकार कर सकती है, क्योंकि उनके माता‑पिता का संबंध लंबे समय से विवाह‑सदृश था। इसके उलट, यदि कोई सम्बन्ध केवल कुछ महीनों का था, छिपा कर रखा गया, दोनों अलग‑अलग परिवारों के साथ भी रहते रहे और समाज में खुद को पति‑पत्नी के रूप में पेश नहीं किया, तो उस स्थिति में विवाह की प्रेज़म्पशन उत्पन्न करना मुश्किल हो सकता है।
समाजिक और नैतिक आयाम
यह निर्णय केवल संपत्ति के हिस्से का विवाद नहीं सुलझाता, बल्कि भारतीय समाज की नैतिक सोच पर भी गहरा प्रभाव डालता है। लिव‑इन रिश्तों पर अभी भी अनेक वर्गों में संदेह और नकारात्मकता है, लेकिन जब सुप्रीम कोर्ट ऐसे संबंधों से जन्मे बच्चों की समानता को स्वीकार करता है, तो समाज को भी यह संदेश जाता है कि बच्चों के अधिकार किसी भी सामाजिक पूर्वाग्रह से ऊपर हैं। इससे लिव‑इन में रहने वाले जोड़ों को भी यह भरोसा मिलता है कि यदि वे संबंध को जिम्मेदारी के साथ निभाते हैं, तो उनके बच्चों को कानून की नजर में किसी भी तरह की दोयम दर्जे की स्थिति का सामना नहीं करना पड़ेगा।
आलोचना और सीमाएँ
फिर भी, कुछ कानूनी विशेषज्ञ इस फैसले को लेकर यह चिंता जताते हैं कि “लंबे समय” और “पति‑पत्नी की तरह” जैसे मानदंड बहुत हद तक न्यायिक विवेक पर निर्भर हैं, जो अलग‑अलग मामलों में अलग निर्णयों की संभावना पैदा कर सकते हैं। डर यह भी है कि कहीं यह निर्णय कुछ लोगों को बिना विवाह के ही लंबे समय तक संबंध बनाए रखने और बाद में विवाद होने पर “विवाह” का दावा करने के लिए प्रोत्साहित न कर दे, जिससे प्रमाण और जांच की प्रक्रिया जटिल हो सकती है। हालांकि, अदालत का दृष्टिकोण स्पष्ट है कि हर मामले में तथ्य और साक्ष्य अत्यंत सावधानी से परखे जाएंगे, और केवल वास्तविक, स्थायी, समाज द्वारा मान्य संबंधों को ही विवाह की प्रेज़म्पशन का लाभ मिलेगा।
आम पाठकों के लिए कानूनी सलाह (जनरल गाइडलाइन)
यदि आप या आपका कोई जानकार लंबे समय से लिव‑इन में है और बच्चों के अधिकारों को लेकर चिंतित है, तो कुछ बुनियादी कदम रिश्ते को अधिक सुरक्षित बना सकते हैं।
- जहाँ संभव हो, सरल रजिस्टर्ड विवाह कराना सबसे सुरक्षित विकल्प है, ताकि भविष्य में सबूत संबंधी विवाद न खड़े हों।
- यदि विवाह नहीं किया है, तो साथ रहने के सबूत, जैसे किराया अनुबंध, संयुक्त बैंक खाता, बीमा या नामांकन फॉर्म में जीवनसाथी के रूप में नाम दर्ज कराना, बच्चों के स्कूल रिकॉर्ड में माता‑पिता के नाम ठीक से दिखवाना आदि पर ध्यान दें।
- पैतृक या स्वयं अर्जित संपत्ति के लिए वसीयत (Will) बनवाना भी उपयोगी है, जिससे बाद में परिवार में अनावश्यक मुकदमेबाज़ी कम हो सकती है।
ध्यान रहे, ऊपर दी गई बातें केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से हैं; किसी भी वास्तविक विवाद की स्थिति में किसी योग्य वकील से व्यक्तिगत परामर्श लेना अनिवार्य है।
निष्कर्ष: बच्चों के अधिकार सबसे ऊपर
सुप्रीम कोर्ट का Kattukandi Edathil Krishnan केस बताता है कि भारतीय न्यायपालिका धीरे‑धीरे पारंपरिक विवाह की परिभाषा से आगे बढ़कर सामाजिक वास्तविकताओं को स्वीकार कर रही है। लंबे समय तक चले लिव‑इन संबंधों से जन्मे बच्चों को अब पैतृक संपत्ति में हिस्सा मिलने का संवैधानिक संरक्षण प्राप्त है, बशर्ते संबंध की प्रकृति और सामाजिक स्वीकार्यता विवाह‑सदृश साबित हो सके। यह फैसला इस मूल सिद्धांत को मजबूत करता है कि कानून का उद्देश्य बच्चों को कलंकित करना नहीं, बल्कि उन्हें समान अवसर और सुरक्षा देना है, चाहे उनके जन्म की परिस्थितियाँ कैसी भी हों।
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