प्रवीण कुमार जैन और अंजू जैन की शादी लंबे समय से नामात्र के लिए बची थी। दंपति 20 साल से अधिक समय से अलग-अलग रह रहे थे। कोई सुलह की गुंजाइश नहीं बची थी। सुप्रीम कोर्ट ने इसे “पूरी तरह मृत” शादी करार दिया।
यह मामला गहराई से पारिवारिक विवादों को दर्शाता है, जहां भावनात्मक और आर्थिक दूरी ने रिश्ते को बर्बाद कर दिया। कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 142 का इस्तेमाल कर शादी भंग की, जो असाधारण परिस्थितियों में न्याय सुनिश्चित करने की शक्ति देता है।
शादी भंग का आधार: अपरिवर्तनीय विघटन का सिद्धांत
सुप्रीम कोर्ट ने अपरिवर्तनीय ब्रेकडाउन ऑफ मैरिज (Irretrievable Breakdown of Marriage) के आधार पर शादी खत्म की। यह सिद्धांत कहता है कि अगर शादी व्यावहारिक रूप से खत्म हो चुकी है, तो कोर्ट इसे कानूनी रूप से समाप्त कर सकता है।
- दंपति की लंबी जुदाई (20+ वर्ष)।
- सुलह की कोई संभावना न होना।
- परिवार पर भावनात्मक बोझ कम करना।
यह फैसला पिछले मामलों जैसे कि कल्पना सिंह बनाम केशव प्रसाद सिंह को मजबूत करता है, जहां कोर्ट ने इसी आधार पर तलाक दिए थे।
भरण-पोषण का ऐतिहासिक पुरस्कार: 6 करोड़ का एकमुश्त भुगतान
कोर्ट ने पति प्रवीण कुमार जैन को निम्नलिखित राशि देने का आदेश दिया:
| प्राप्तकर्ता | राशि | उद्देश्य |
|---|---|---|
| पत्नी अंजू जैन | ₹5 करोड़ | एकमुश्त स्थायी भरण-पोषण |
| वयस्क पुत्र | ₹1 करोड़ | उच्च शिक्षा और वित्तीय सुरक्षा |
यह राशि पति की आर्थिक क्षमता, पत्नी की जरूरतों और पुत्र की शिक्षा लागत को ध्यान में रखकर तय की गई। कोर्ट ने माना कि प्रतियोगी उच्च शिक्षा महंगी है और पुत्र अभी भी आश्रित है।
स्थायी भरण-पोषण तय करने के दिशानिर्देश: राजनेश बनाम नेहा का विस्तार
सुप्रीम कोर्ट ने राजनेश बनाम नेहा (2020) मामले के दिशानिर्देशों को दोहराया और विस्तार दिया। ये कारक सभी अदालतें भरण-पोषण तय करते समय विचार करेंगी:
- पक्षकारों की सामाजिक और आर्थिक स्थिति।
- पत्नी और आश्रित बच्चों की उचित जरूरतें।
- व्यक्तिगत योग्यताएं और रोजगार स्थिति।
- आवेदक (पत्नी) की स्वतंत्र आय या संपत्ति।
- वैवाहिक घर में जीया गया जीवन स्तर।
- परिवार जिम्मेदारियों के लिए त्यागे गए रोजगार।
- गैर-कामकाजी पत्नी के मुकदमे के खर्च।
- पति की वित्तीय क्षमता, आय, दायित्व और बकाया।
ये दिशानिर्देश सुनिश्चित करते हैं कि भरण-पोषण न तो पति को सजा दे, बल्कि पत्नी को वैवाहिक जीवन स्तर के अनुरूप जीवन दे।
प्रमुख कानूनी सिद्धांत: वित्तीय पारदर्शिता और न्याय का संतुलन
फैसले का मूल सिद्धांत यह है कि स्थायी भरण-पोषण का उद्देश्य आश्रित पति/पत्नी को तलाक के बाद उचित जीवन स्तर देना है। यह वैवाहिक जीवन के मानक से मेल खाना चाहिए।
कोर्ट ने वित्तीय पारदर्शिता पर जोर दिया:
- दोनों पक्षों को आय, संपत्ति के दस्तावेज जमा करने होंगे।
- झूठे बयान पर सजा का प्रावधान।
यह फैसला हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 25 और दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 125 को मजबूत करता है।

इस फैसले का प्रभाव: तलाक कानून में नया दौर
यह निर्णय लाखों पारिवारिक विवादों को प्रभावित करेगा।
- लंबे अलगाव पर तलाक आसान।
- भरण-पोषण में एकरूपता।
- वयस्क बच्चों की सुरक्षा।
महिलाओं के अधिकार संगठनों ने इसे स्वागत किया, जबकि पुरुष संगठनों ने राशि पर सवाल उठाए। भविष्य में अदालतें इन दिशानिर्देशों का सख्ती से पालन करेंगी।
यह लैंडमार्क फैसला न्यायिक पारदर्शिता का प्रतीक है, जो कानूनी जटिलताओं को आमजन तक पहुंचाता है। सुप्रीम कोर्ट की वेबसाइट पर पूरा फैसला उपलब्ध है।
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