बलात्कार मामलों में डीएनए जांच अनिवार्य: दिल्ली हाईकोर्ट का आदेश — सहयोग न करने पर पुलिस कर सकती है बल प्रयोग [धारा 53A CrPC]
🗓 तारीख: 19 जुलाई 2025
🧾 केस संख्या: CRL.MC 2984/2023
⚖️ पक्षकार: सुश्री एक्स बनाम राज्य (राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली)
दिल्ली उच्च न्यायालय ने एक ऐतिहासिक निर्णय में स्पष्ट किया है कि बलात्कार या उसके प्रयास के मामलों में अभियुक्त से डीएनए परीक्षण हेतु रक्त का नमूना लेना अनिवार्य है, और यदि अभियुक्त सहयोग न करे तो पुलिस उचित बल का प्रयोग कर सकती है। यह फैसला न्यायमूर्ति नीना बंसल कृष्णा ने सुश्री एक्स बनाम राज्य (NCT दिल्ली) मामले में सुनाया।
न्यायालय ने भारतीय दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 53A को अत्यंत महत्वपूर्ण मानते हुए कहा कि वैज्ञानिक साक्ष्य इकट्ठा करना जांच की निष्पक्षता और पीड़िता को न्याय दिलाने के लिए आवश्यक है।
🔬 डीएनए परीक्षण: ‘लगभग पूर्ण विज्ञान’
अदालत ने डीएनए जांच को ‘लगभग पूर्ण विज्ञान’ बताते हुए कहा कि यह बलात्कार के आरोपों की पुष्टि या खंडन करने में निर्णायक भूमिका निभाता है। न्यायमूर्ति कृष्णा ने स्पष्ट किया कि धारा 53A CrPC का उद्देश्य अभियुक्त की चिकित्सा और फोरेंसिक जांच को सुनिश्चित करना है — विशेषकर यौन अपराधों में। अगर पुलिस जांच के दौरान इस कानूनी प्रावधान की अनदेखी करती है, तो जांच अधिकारियों को गंभीर परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं।
📘 धारा 53A CrPC की कानूनी व्याख्या:
इस धारा के अंतर्गत यदि ऐसा विश्वास किया जाए कि अभियुक्त की मेडिकल जांच से बलात्कार या उससे जुड़े अपराधों से संबंधित साक्ष्य मिल सकते हैं, तो पुलिस अभियुक्त से रक्त या अन्य जैविक नमूने लेने के लिए उसे जांच हेतु बाध्य कर सकती है। यदि अभियुक्त सहयोग नहीं करता, तो उचित बल का प्रयोग कानूनन अनुमेय है।
न्यायालय ने कहा:
“जब अभियुक्त सहयोग नहीं करता, तब धारा 53A के तहत वैज्ञानिक साक्ष्य प्राप्त करने के लिए बल प्रयोग किया जा सकता है — और यह पूरी तरह वैध है।”
⚖️ पीड़िता और अभियुक्त दोनों के अधिकारों का संतुलन जरूरी
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि न्यायिक प्रक्रिया में अभियुक्त के मौलिक अधिकारों की भी रक्षा की जानी चाहिए। यदि अभियुक्त और पीड़िता के बीच किसी प्रकार के संपर्क का कोई साक्ष्य नहीं है, तो डीएनए जांच की आवश्यकता पर पुनर्विचार किया जा सकता है। अदालतों को प्रत्येक मामले की परिस्थितियों के अनुसार निर्णय लेना चाहिए।
👨👩👦 पितृत्व विवाद और वैवाहिक स्थिति की पृष्ठभूमि
इस मामले में याचिकाकर्ता ने दावा किया था कि उसके और अभियुक्त के संबंध से एक संतान का जन्म हुआ था। अभियुक्त ने डीएनए परीक्षण का विरोध करते हुए तर्क दिया कि महिला विवाहित थी, अतः भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 की धारा 112 के तहत बच्चा उसके पति का ही माना जाएगा।
परंतु, न्यायालय ने अभियुक्त की आपत्ति को खारिज करते हुए कहा कि यौन संपर्क के समय पीड़िता अपने पति से अलग रह रही थी, इसलिए धारा 112 के तहत वैधता का अनुमान स्वतः नहीं लगाया जा सकता। न्यायालय ने यह भी जोड़ा कि:
“ऐसे मामलों में डीएनए परीक्षण से बेहतर कोई साक्ष्य नहीं हो सकता।”
🧾 अंतिम आदेश: डीएनए जांच के लिए अभियुक्त को बुलाया गया
उच्च न्यायालय ने याचिका स्वीकार करते हुए अभियुक्त को डीएनए परीक्षण के लिए रक्त नमूना देने का निर्देश दिया। न्यायालय ने टिप्पणी की कि:
“यौन उत्पीड़न से जुड़े मामलों में डीएनए जांच केवल स्वीकार्य ही नहीं, बल्कि कई बार अनिवार्य भी होती है — ताकि सत्य स्थापित हो सके और न्याय सुनिश्चित किया जा सके।”
⚖️ वकीलों की उपस्थिति:
- याचिकाकर्ता की ओर से: वरिष्ठ अधिवक्ता सुश्री नंदिता राव, सुश्री अदिति शिवधात्री, प्रेरणा सिंह, जागृति सिंह, ममता साहा, श्री अमित पेसवानी, श्री अंकुर राघव
- राज्य की ओर से: श्री शोएब हैदर (एपीपी), एसआई उदय सिंह (पीएस साकेत)
- अभियुक्त की ओर से: वरिष्ठ अधिवक्ता श्री राकेश कुमार खन्ना, श्री हर्ष प्रभाकर, श्री ध्रुव चौधरी, पल्लवी गर्ग, अनिरुद्ध तंवर, शुभम सौरव
📌 निष्कर्ष:
दिल्ली हाईकोर्ट का यह निर्णय यौन अपराधों की जांच में वैज्ञानिक साक्ष्यों की निर्णायक भूमिका को स्पष्ट करता है। साथ ही यह फैसला पुलिस और न्यायिक अधिकारियों के लिए एक महत्वपूर्ण मार्गदर्शक है कि कैसे अभियुक्त के अधिकारों और पीड़िता के न्याय के बीच संतुलन बनाते हुए कानूनी प्रक्रिया का पालन किया जाए।



















