अरविंद केज़रीवाल केस में जस्टिस स्वरण कांत शर्मा ने अपनी विचाराधीशता क्यों नहीं छोड़ी? 12 बड़ी वजहें जानिए
दिल्ली उच्च न्यायालय की न्यायमूर्ति स्वरना कांता शर्मा ने 2026 में अरविंद केजरीवाल की उस याचिका को खारिज कर दिया जिसमें उन्होंने जज की बर्खास्तगी की मांग की थी। केजरीवाल ने दावा किया था कि जस्टिस शर्मा का कथित ईडी (प्रवर्तन निदेशालय) के प्रति झुकाव मामले में पूर्वाग्रह पैदा करता है। हालांकि, अदालत ने इसे “असंगत और राजनीतिक रूप से प्रेरित” बताते हुए 12 स्पष्ट कारणों से खारिज कर दिया, जो न्यायिक अखंडता को मजबूत करते हैं। यह फैसला शराब नीति घोटाले से जुड़े मामले में पारदर्शिता बहाल करता है।
कारण 1: कोई प्रत्यक्ष पूर्वाग्रह का प्रमाण नहीं
न्यायमूर्ति ने कहा कि केजरीवाल पक्ष ने कोई ठोस सबूत पेश नहीं किया जो उनके पूर्वाग्रह को साबित करे। मात्र आरोप लगाना पर्याप्त नहीं; कानूनी प्रक्रिया में वास्तविक प्रमाण आवश्यक है। यह सिद्धांत भारतीय न्यायिक परंपरा का मूल है।
कारण 2: ईडी के प्रति कथित समर्थन का खंडन
केजरीवाल ने जस्टिस शर्मा के ईडी अधिकारियों के पक्ष में टिप्पणियों का हवाला दिया, लेकिन अदालत ने स्पष्ट किया कि ये टिप्पणियां न्यायिक प्रक्रिया की रक्षा के लिए थीं, न कि एजेंसी के पक्ष में। ऐसी टिप्पणियां सामान्य न्यायिक अभ्यास हैं।
कारण 3: न्यायिक टिप्पणियों का संदर्भ
पिछले फैसलों में जस्टिस शर्मा की टिप्पणियां संदर्भ से बाहर ली गईं। अदालत ने जोर दिया कि न्यायाधीश की टिप्पणियां मामले के तथ्यों पर आधारित होती हैं, न कि व्यक्तिगत राय पर।
कारण 4: राजनीतिक दबाव का आरोप निराधार
याचिका को राजनीतिक मंच बनाने का प्रयास बताते हुए जस्टिस ने कहा कि बर्खास्तगी का दावा न्याय से बचने की चाल है। उच्चतम न्यायालय के दिशानिर्देशों के अनुसार, पूर्वाग्रह साबित करने के लिए वास्तविक आधार जरूरी।
कारण 5: प्राकृतिक न्याय का सिद्धांत बरकरार
प्राकृतिक न्याय न्यायिक निष्पक्षता पर जोर देता है, लेकिन स्वत: बर्खास्तगी का प्रावधान नहीं। जस्टिस शर्मा ने अपनी निष्पक्षता पर विश्वास जताया और मामले को आगे बढ़ाया।
कारण 6: समानांतर बेंच का हवाला गलत
केजरीवाल ने कहा कि समानांतर बेंच ने भिन्न टिप्पणियां कीं, लेकिन अदालत ने स्पष्ट किया कि विभिन्न बेंच अलग-अलग तथ्यों पर फैसला लेते हैं। तुलना अमान्य है।

कारण 7: कानूनी पूर्वाधार का अभाव
याचिका में कोई विधिक आधार नहीं था। न्यायमूर्ति ने इसे “दुरुपयोग” करार दिया, जो न्यायिक संसाधनों की बर्बादी करता।
कारण 8: समयबद्धता और विलंब रणनीति
बर्खास्तगी की मांग अंतिम समय पर की गई, जो सुनवाई में विलंब पैदा करने का प्रयास था। अदालत ने इसे खारिज करते हुए मामले को प्राथमिकता दी।
कारण 9: उच्चतम न्यायालय के फैसलों का हवाला
सुप्रीम कोर्ट के रुख जैसे रंजीत ठाकुर बनाम उड़ीसा राज्य मामले का उल्लेख कर जस्टिस ने कहा कि पूर्वाग्रह व्यक्तिपरक धारणा नहीं, वस्तुगत होना चाहिए।
कारण 10: न्यायपालिका की स्वतंत्रता
यह फैसला न्यायपालिका को राजनीतिक हस्तक्षेप से बचाता है। जस्टिस शर्मा ने जोर दिया कि न्यायाधीश स्वयं अपनी अक्षमता तय करते हैं।
कारण 11: सार्वजनिक हित और पारदर्शिता
फैसले से न्यायिक पारदर्शिता मजबूत हुई। यह जनता को आश्वस्त करता है कि कानूनी मामलों में पूर्वाग्रह नहीं पनपने दिया जाएगा।
कारण 12: आगे की सुनवाई का आदेश
बर्खास्तगी याचिका खारिज कर अदालत ने मामले की मेरिट पर सुनवाई जारी रखने का आदेश दिया, जो न्याय प्रक्रिया को गति देता है।
निहितार्थ: राजनीति बनाम न्याय
यह फैसला AAP और केजरीवाल के लिए झटका है, लेकिन न्यायपालिका की मजबूती दर्शाता है। शराब नीति मामले में ईडी जांच जारी रहेगी। भविष्य में ऐसे दावों के लिए सख्त प्रमाण जरूरी होंगे।



















