🔍 सुप्रीम कोर्ट की ED को फटकार: छत्तीसगढ़ के केस में पूछा- कहां हैं सबूत

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सुप्रीम कोर्ट ने प्रवर्तन निदेशालय (ED) की जांच प्रक्रिया पर गंभीर सवाल खड़े करते हुए उसकी कार्यप्रणाली को “गैर-पारदर्शी” और “मानवाधिकारों के विरुद्ध” बताया है। कोर्ट की यह तीखी टिप्पणी उस समय आई जब वह 2,000 करोड़ रुपये के छत्तीसगढ़ शराब घोटाले में मनी लॉन्ड्रिंग के आरोपी की ज़मानत याचिका पर सुनवाई कर रही थी।

⚖️ सुप्रीम कोर्ट की तल्ख टिप्पणी:

जस्टिस अभय ओका ने साफ कहा कि “बिना किसी ठोस सबूत के सिर्फ़ आरोप लगाना कानून के शासन के खिलाफ है।” कोर्ट ने ईडी को चेताया कि वह अपनी जांच प्रणाली में पारदर्शिता लाए और मानवाधिकारों का सम्मान करे।

उन्होंने अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल से पूछा, “आपने आरोप लगाया कि आरोपी ने 40 करोड़ रुपये कमाए, पर क्या आपने यह दिखाया कि वह किसी कंपनी का निदेशक है, या प्रमुख हिस्सेदार है? कोई तो कड़ी होनी चाहिए!”

🧾 “जांच प्रक्रिया नहीं, सजा बन गई है”

5 मई की सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी की कि ईडी की लंबी और अंतहीन जांच एक तरह से व्यक्ति को सजा देने जैसा है। तीन आरोपपत्र दाखिल होने के बावजूद भी आरोपी को जेल में रखना न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ है।

यह पहला मौका नहीं है जब ED की जांच शैली पर सुप्रीम कोर्ट ने सवाल उठाए हों। जनवरी 2025 में हरियाणा के पूर्व कांग्रेस विधायक सुरेंद्र पंवार की 15 घंटे लंबी पूछताछ को कोर्ट ने “अमानवीय” और “क्रूर” करार दिया था।

📉 ईडी की सजा दर पर सवाल

पिछले साल नवंबर में, बंगाल के पूर्व मंत्री पार्थ चटर्जी की ज़मानत याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने ईडी की “बहुत खराब” सजा दर पर चिंता जताई थी। सरकार के अनुसार, 2014 से 2024 के बीच 5,297 मामलों में सिर्फ़ 40 में सजा हुई — यानी सिर्फ़ 0.75%।

👨‍⚖️ अदालतों से बार-बार चेतावनी:

  • सुप्रीम कोर्ट की तीन-जजों की पीठ ने ईडी से कहा था कि वह वैज्ञानिक और प्रमाण आधारित जांच करें।
  • दिल्ली हाईकोर्ट ने भी आप विधायक अमानतुल्लाह खान की ज़मानत देते हुए ईडी को मुकदमे में देरी के लिए फटकारा था।

🗳️ विपक्ष का आरोप: “ईडी बन चुकी है राजनीतिक हथियार”

कांग्रेस, आम आदमी पार्टी, तृणमूल कांग्रेस और समाजवादी पार्टी जैसे दलों का आरोप है कि ईडी का इस्तेमाल केवल विपक्षी नेताओं को डराने और चुनावों में उन्हें कमजोर करने के लिए हो रहा है।
राहुल गांधी ने कहा, “ED अब कानून की संस्था नहीं, मोदी सरकार का राजनीतिक औजार बन चुकी है।”
AAP के संजय सिंह का आरोप है कि ईडी, सीबीआई और आयकर विभाग को “विपक्ष मिटाओ अभियान” में तब्दील कर दिया गया है।

🤔 अब बड़ा सवाल…

क्या सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी ईडी की कार्यप्रणाली में बदलाव लाएगी?
क्या सरकार इन आलोचनाओं को गंभीरता से लेकर जवाबदेही तय करेगी?
या फिर ईडी उसी तरह सत्ता के इशारों पर काम करती रहेगी, जैसे विपक्ष आरोप लगाता आया है?


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